आज फिर यूँही ‘किस क़दर प्यार से ऐ जाने जहाँ रखा है, दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ’ …
रुखसत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया
वो क्यूँ गया है ये भी बताकर नहीं गया
यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा
जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया
बस इक लकीर खेंच गया दरमियान में
दीवार रास्ते में बनाकर नहीं गया.
घर में हैं आजतक, वही खुशबू बसी हुई
लगता है यूँ कि जैसे वो आकर नहीं गया
रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे
और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया
शहज़ाद अहमद
